पाँच करोड़ प्रवासी पक्षियों के लिए पीले सागर के ज्वारीय मैदानों की पुनरुद्ध्धार में आप क्या योगदान दे सकते हैं?
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बुसान, दक्षिण कोरिया। कल्पना कीजिए एक लंबी तटरेखा के किनारे खड़े होकर देखने की। वहाँ आती-जाती लहरों की थाह पर एक महाद्वीप की ज़िंदगी तय होती है।
पीले सागर के ज्वारीय मैदान चीन, उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया तक फैले हुए हैं। हर साल यहाँ लाखों प्रवासी पानी पक्षी आबाद होते हैं। यह गीला इलाका पूर्व एशियाई और ऑस्ट्रेलियाई पंखी मार्ग की रीढ़ की हड्डी है। यह उन बर्फ़ीले इलाकों को जोड़ता है जहाँ पक्षी घोंसले बनाते हैं और फिर उन्हें दक्षिण एशिया, ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैंड के ठंडे इलाकों में सिर झुकाकर रहना पड़ता है। प्रतिवर्ष पाँच करोड़ दरियायी पक्षी और सील पक्षी इस रास्ते का भरोसा रखते हैं। यहाँ के मछुआरे समुदाय भी इन पानी की देन से जीते आए हैं। समृद्ध समुद्री जीवन से उन्हें भोजन मिलता है। यह क्षेत्र तूफानों की शक्ति को सोखने वाला प्राकृतिक ढाल भी है। यह किनारों को ठोस बनाए रखता है।
जब देश मिलकर इतने विशाल नेटवर्क की रक्षा करते हैं तो नतीजा क्या निकलता है। संरक्षण विशेषज्ञों ने पहले से ही एक साथ काम करने की योजना बना ली है। अब वे मिट्टी वाले मैदानों को एक जीवित तंत्र मानते हुए देख रहे हैं। ये चहबड़े गीले इलाके नीले कार्बन को अपने भीतर धारण करते हैं। यह कार्बन वैश्विक जलवायु को स्थिर रखने में मदद करता है। यहाँ खानभान चौंका पक्षी, ग्रेट क्नॉट और ब्लैक-फेस्ड स्पूनबिल जैसे दुर्लभ प्रजातियों को घर मिलता है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने हाल ही में यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा दिए जाने के कारण इस इलाके का सम्मान बढ़ाया है। अब अधिक स्थानों को सूची में शामिल करने की प्रक्रिया चल रही है। इस मान्यता से हर भागीदार क्षेत्र को लाभ होगा। हम सभी मिलकर पक्षियों की निगरानी करेंगे। नियम एक होंगे। अनुसंधान के लिए नये रास्ते खुलेंगे।
बुसान में हुए विश्व धरोहर समिति के अड़तालीसवें सत्र में प्रतिनिधियों ने लंबे समय तक सुरक्षा के व्यावहारिक तरीके खोजे। हुई बातचीत से एक बात साफ निकली। जब सीमाएं पुल बन जाते हैं तब ही वातावरण में जानदार स्वस्थता लौटती है। अब वैज्ञानिक और स्थल प्रबंधक पक्षियों की माइग्रेशन डेटा तात्कालिक साझा करते हैं। वे मरम्मत के तरीकों को सामंजस्य बिठाते हैं। स्थानीय लोगों को शामिल करके शिक्षा कार्यक्रम भी चलाते हैं। बुसान घोषणा पत्र ने इस रुख को औपचारिक रूप दिया है। इसे विरासत संधि की छठी मुख्य नीति घोषित किया गया है। यह ढांचा बताता है कि प्राकृतिक पर्यावरण की देखभाल कैसे कूटनीति में भरोसा पैदा करती है। साझा संसाधन क्षेत्रीय सहयोग के बीज बन जाते हैं।
तटीय इलाके बदलते रहते हैं। ऐसे में ये सहयोगी प्रयाग कैसे विकसित होंगे। अनुकूलन प्रबंधन की योजनाएँ बन रही हैं। इनमें परंपरागत ज्ञान और आधुनिक उपग्रह निगरानी को मिलाया गया है। टिकाऊ जीविका कार्यक्रमों को डिजाइन किया जा रहा है। इनका उदेश्य तटीय गाँवों का सहारा देना और खाद्य स्थलों को बचाना है। सीमा पार तकनीकी नेटवर्क्स में निवेश जारी है। इससे मौसम बदलने या पक्षियों के रास्ता बदलने पर संरक्षण कार्य तेजी से प्रतिक्रिया कर सकता है। आपकी जागरूकता और सहयोग इन पहलों को और मजबूत बनाता है। लहरें तट से बहुत आगे तक फैल जाती हैं। अंतरराष्ट्रीय साझेदारी मज़बूत होती जाएगी। पीला सागर की ज्वारीय मैदान साबित करेंगे कि एकजुटता कैसे न सिर्फ पारिस्थितिकी तंत्र को बल्कि पीढ़ियों तक चलने वाले शांतिपूर्ण रिश्तों को भी तराशती है।